रायगढ़: औद्योगिक नगरी रायगढ़, जो पूरे छत्तीसगढ़ का राजस्व खजाना भरने में अग्रणी है, आज भारतीय रेल के नक्शे पर एक ‘बेबस स्टेशन’ बनकर रह गया है। यहाँ की जनता के साथ हो रहा सौतेला व्यवहार अब बर्दाश्त की सीमा पार कर चुका है। गोवा एक्सप्रेस और नांदेड़ एक्सप्रेस के बाद अब तिरुपति एक्सप्रेस के ठहराव को भी दरकिनार कर दिया गया है, जो सीधे तौर पर हमारे जनप्रतिनिधियों और प्रदेश के मुखिया की घोर विफलता को उजागर करता है।
सत्ता के गलियारों में गूँजती खामोशी
रायगढ़ क्षेत्र से ही ताल्लुक रखने वाले मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का इस मामले पर मौन रहना, स्थानीय जनता के लिए सबसे बड़ा आघात है। जब प्रदेश का मुखिया स्वयं इस जिले का प्रतिनिधित्व करने का दावा करता हो और उसके गृह-जिले की रेल कनेक्टिविटी एक-एक कर छिन रही हो, तो यह उस नेतृत्व की नैतिक और राजनीतिक विफलता का सबसे बड़ा सबूत है।
ट्रेनों की सूची, और रसातल में गिरता रसूख
रायगढ़ के साथ हो रहा यह सिलसिला महज एक संयोग नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित उपेक्षा है:
गोवा एक्सप्रेस: वर्षों से मांग के बावजूद ठहराव नदारद।
नांदेड़ एक्सप्रेस: संभाग की धार्मिक आस्था को कुचलते हुए ठहराव देने से इनकार।
तिरुपति एक्सप्रेस: अब इस महत्वपूर्ण ट्रेन का भी स्टॉपेज न मिलना, यह साबित करता है कि रेलवे के नक्शे पर रायगढ़ की आवाज का कोई मोल नहीं है।
नेतृत्व में इच्छाशक्ति का घोर अभाव
क्या मुख्यमंत्री के लिए रायगढ़ की जनता की तकलीफें सिर्फ चुनावी मुद्दे हैं? क्या ‘डबल इंजन’ सरकार की धमक केवल दिल्ली के बंद कमरों तक सीमित है? रायगढ़ के जनप्रतिनिधि और राज्य की पूरी मशीनरी इस मामले पर एक ‘मिली-जुली खामोशी’ साधे हुए हैं। न कोई ठोस दबाव, न कोई प्रभावशाली पैरवी, और न ही रेल मंत्रालय के सामने शहर की जायज मांगों को मजबूती से रखने का दम।
क्या मुख्यमंत्री के लिए रायगढ़ का रेल ठहराव केवल एक चुनावी जुमला मात्र है?
क्या रायगढ़ के नेताओं का राजनीतिक कद इतना छोटा हो गया है कि वे रेलवे के छोटे अधिकारियों के सामने भी अपनी बात मनवाने में अक्षम हैं?
औद्योगिक शहर होने के बावजूद जनता को ‘दोयम दर्जे’ का नागरिक क्यों समझा जा रहा है?
जवाबदेही का समय
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और उनके अधीन काम करने वाले तमाम जनप्रतिनिधियों को यह समझना होगा कि जनता ने उन्हें कुर्सी इसलिए नहीं दी कि वे मूकदर्शक बनकर रहें और रायगढ़ का गौरव ट्रेनों की तरह गुजरता रहे।
रायगढ़ की जनता अब खोखले वादों और फोटो-सेशन की राजनीति से ऊब चुकी है। यदि प्रदेश का मुखिया अपने ही गृह-क्षेत्र की न्यूनतम रेल सुविधाएं सुनिश्चित नहीं करवा सकता, तो इसे उनकी अक्षमता का चरम माना जाएगा। समय आ गया है कि जनता अब इन कमजोर कंधों से तीखे सवाल करे। यह सिर्फ ट्रेनों के ठहराव की लड़ाई नहीं, यह रायगढ़ के स्वाभिमान और राजनीतिक अस्तित्व को बचाने की लड़ाई है।
क्या आपको लगता है कि मुख्यमंत्री के 20 वर्षीय लोकसभा कार्यकाल में ही इतनी बड़ी रेल उपेक्षा, आने वाले समय में उनके राजनीतिक भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो सकती है?

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