
रायगढ़। छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक और औद्योगिक रूप से सबसे समृद्ध जिलों में शुमार रायगढ़ के साथ प्रशासनिक स्तर पर दशकों से सौतेला व्यवहार जारी है। रियासतों के विलय के बाद 1948 में अस्तित्व में आए रायगढ़ जिले को आज सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी संभाग (डिवीजन) मुख्यालय का दर्जा नहीं मिल सका। विडंबना यह है कि रायगढ़ के साथ ही बने अन्य जिले जैसे बस्तर (जगदलपुर) और सरगुजा (अंबिकापुर) वर्षों पहले संभाग मुख्यालय बन चुके हैं, जबकि रायगढ़ प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार बना हुआ है।
1948 का इतिहास और प्रशासनिक उपेक्षा
देश की आजादी और रियासतों के भारतीय संघ में विलय के दौर में 1948 में रायगढ़ को स्वतंत्र जिले का दर्जा दिया गया था। तत्कालीन मध्य प्रांत (CP & Berar) और बाद में मध्य प्रदेश के गठन के समय रायगढ़ एक बड़ा प्रशासनिक और सांस्कृतिक केंद्र था। उस दौर में बस्तर और सरगुजा भी जिला बने। समय के साथ प्रशासनिक विकेंद्रीकरण हुआ और सरगुजा व बस्तर को स्वतंत्र संभाग मुख्यालय घोषित कर वहां कमिश्नर, आईजी स्तर के कार्यालय और उच्च प्रशासनिक ढांचा खड़ा किया गया। वहीं रायगढ़ पहले बिलासपुर संभाग के अधीन रहा और आज भी प्रशासनिक कार्यों के लिए संभाग स्तर पर निर्भर बना हुआ है।
राजस्व और उद्योग में शीर्ष, फिर भी हक से वंचित
रायगढ़ जिला प्रदेश और देश के खजाने में राजस्व देने के मामले में अग्रणी है:
उद्योग व खनिज: पावर प्लांट, स्टील इंडस्ट्री और वृहद कोयला खदानों से यह क्षेत्र राज्य को भारी राजस्व और रॉयल्टी देता है।
सांस्कृतिक पहचान: चक्रधर समारोह और कथक की रायगढ़ घराना परंपरा से इस शहर की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान है।
भौगोलिक महत्व: ओडिशा सीमा से सटा यह जिला रणनीतिक और व्यापारिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण जंक्शन है।
इसके बावजूद न तो राजनीतिक नेतृत्व ने इस मांग को उस ताकत से उठाया और न ही प्रशासनिक पुनर्गठन के समय रायगढ़ को उसका वाजिब हक मिला।
अंबिकापुर और जगदलपुर का विकास, रायगढ़ की ठिठक
जब अंबिकापुर और जगदलपुर को संभाग मुख्यालय बनाया गया, तो वहां संभागीय आयुक्त, पुलिस महानिरीक्षक (IG), संभागीय संयुक्त संचालक (स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि आदि) के दफ्तर खुले। इससे वहां के नागरिकों को बुनियादी व प्रशासनिक फैसलों के लिए दूसरे शहरों के चक्कर नहीं लगाने पड़े। इसके विपरीत, रायगढ़ के निवासियों और आसपास के क्षेत्रों को संभागीय स्तर के अपीलीय मामलों, प्रशासनिक स्वीकृतियों और उच्च स्तरीय सुनवाई के लिए आज भी बिलासपुर की दौड़ लगानी पड़ती है।
उठने लगी है आवाज रायगढ़,सारंगढ़ और सक्ति जिलों को मिला अब रायगढ़ को नया संभाग बनाने की मांग
अब स्थानीय प्रबुद्ध वर्ग, व्यापारी संगठन और आम नागरिक यह सवाल पूछने लगे हैं कि जब 1948 में साथ अस्तित्व में आए जिले संभाग मुख्यालय बनकर विकास की नई ऊंचाइयां छू सकते हैं, तो अपार खनिज, उद्योग और सांस्कृतिक संपदा से भरा रायगढ़ आज भी संभाग मुख्यालय के लिए क्यों तरस रहा है? क्या आने वाले समय में रायगढ़ को नया संभाग मुख्यालय बनाकर इस ऐतिहासिक उपेक्षा को समाप्त किया जाएगा?


