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नीतीश कुमार के वादे की 28वीं बरसी: कई दिग्गज दुनिया छोड़ गए, जो बचे वो सत्ता के शिखर पर; रायगढ़ के हिस्से आया सिर्फ उपेक्षा का काला पत्थर!

रायगढ़ ब्यूरो:
रायगढ़ रेलवे स्टेशन की दीवार पर जड़ा यह काला संगमरमर महज़ एक पत्थर नहीं, बल्कि इस औद्योगिक अंचल की छाती पर 28 साल से गड़ा वो कील है जो हर रोज़ यहां की जनता को व्यवस्था के खोखलेपन का अहसास कराती है। तारीख दर्ज है—14 सितम्बर 1998। उस रोज़ तत्कालीन केंद्रीय रेल मंत्री नीतीश कुमार ने रायगढ़ रेलवे स्टेशन के नवीनीकरण का उद्घाटन किया था और इसी मंच से रायगढ़ को देश के महानगरों से जोड़ने के लिए ‘कोचिंग टर्मिनल’, वाशिंग लाइन व आधुनिक पिट लाइन की सौगात देने का दंभ भरा गया था।
तस्वीर का सबसे कड़वा पहलू देखिए: उस ऐतिहासिक शिलापट्ट पर जिन दिग्गजों के नाम दर्ज हैं, उनमें से अजीत जोगी, लखीराम अग्रवाल, दिलीप सिंह जूदेव, नंदकुमार पटेल और परसराम भारद्वाज जैसे कद्दावर राजनेता अब इस दुनिया में ही नहीं रहे। वहीं जो जीवित हैं—चाहे महाराष्ट्र के राज्यपाल रह चुके रमेश बैस हों या खुद बिहार के मुख्यमंत्री व केंद्र सरकार के सबसे अहम साझेदार नीतीश कुमार—वे सत्ता के शीर्ष पर बैठे हैं। एक पूरी पीढ़ी गुज़र गई, राजनीति के युग बदल गए, लेकिन रायगढ़ का कोचिंग टर्मिनल आज भी रेलवे की सड़ी-गली फाइलों में दम तोड़ रहा है।
2006 का संसद सत्र: जब बिलासपुर को ढाल बनाकर छीना गया हक
वादे के आठ साल बाद, 23 अगस्त 2006 को तत्कालीन सांसद गुहाराम अजगल्ले ने लोकसभा के शून्य काल में 14 सितंबर 1998 के इसी शिलापट्ट का हवाला देकर संसद में आवाज़ बुलंद की थी। लेकिन रेलवे बोर्ड और SECR ने निहायत ढुलमुल रवैया दिखाते हुए पुराना बहाना थमा दिया—”बिलासपुर पास में है, रायगढ़ में अलग से टर्मिनल की कोई जरूरत नहीं।”
दोगलेपन की इंतहा देखिए: जब रायगढ़ और मांड-रायगढ़ कोलफील्ड्स से चौबीसों घंटे लाखों टन कोयला और जिंदल-मोनेट जैसे उद्योगों से स्टील ढोकर रेलवे को अपनी तिजोरी भरनी होती है, तब बिलासपुर की दूरी कभी आड़े नहीं आती। रायगढ़ से अरबों का मालभाड़ा वसूलने में रेलवे को कोई अड़चन नहीं दिखती, लेकिन जब यहां के करदाताओं के लिए एक वाशिंग लाइन और टर्मिनल बनाने की बारी आती है, तो बिलासपुर तुरंत पड़ोसी बन जाता है!
सत्ता की धुरी रायगढ़, फिर भी जुबान पर ताला क्यों?
आज रायगढ़ राजनीतिक रूप से अपने सबसे ताकतवर दौर में खड़ा है। इतिहास में ऐसा मौका कभी नहीं आया जब सत्ता के शीर्ष पदों पर इसी माटी के नुमाइंदे काबिज हों:
रायगढ़ लोकसभा से लगातार चार बार सांसद रहे विष्णुदेव साय आज राज्य के मुख्यमंत्री हैं।
रायगढ़ के अपने विधायक ओ.पी. चौधरी प्रदेश के सबसे कद्दावर वित्त मंत्री हैं।
लोकसभा में राधेश्याम राठिया और राज्यसभा में रायगढ़ राजपरिवार के देवेन्द्र प्रताप सिंह संसद के दोनों सदनों में क्षेत्र की नुमाइंदगी कर रहे हैं।
केंद्र की एनडीए सरकार आज भी उसी नीतीश कुमार की अहम भूमिका के साथ चल रही है, जिन्होंने 1998 में यह आधारशिला रखी थी।
जब डबल इंजन सरकार के पहिए रायगढ़ के ही नेताओं के इर्द-गिर्द घूम रहे हैं, तब यह सन्नाटा क्यों है? क्या रायगढ़ से दिल्ली तक एक साझा डेलिगेशन ले जाकर अपने हक का टर्मिनल छीन लाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति किसी में नहीं बची?
सुविधा मांगने पर हाथ खाली, राजस्व देने में नंबर वन
आज भी जब रायगढ़ से दिल्ली, मुंबई या दक्षिण भारत के लिए सीधी ट्रेन मांगी जाती है, तो रेलवे का बंधा-बंधाया जवाब आता है—”रायगढ़ में ट्रेन मेंटेनेंस और टर्मिनल की सुविधा नहीं है।” विडंबना की पराकाष्ठा देखिए: जिस टर्मिनल की कमी का रोना रोकर रायगढ़ के हाथ खाली रखे जाते हैं, उसकी नींव का पत्थर 28 साल पहले खुद देश का रेल मंत्री गाड़ कर गया था!
सवाल सीधा और चुभने वाला है: क्या रायगढ़ सिर्फ प्रदूषण की कालिख फांकने और रेलवे का खजाना भरने के लिए बना है? जब दुनिया छोड़ चुके नेताओं के वादों को पूरा करने की जहमत सत्ता के शिखर पर बैठे जीवित दिग्गज नहीं उठा सकते, तो यह काला संगमरमर हर रोज़ रायगढ़वासियों के स्वाभिमान को ही कचोटता रहेगा।

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