रायगढ़। छत्तीसगढ़ की संस्कारधानी के बाद औद्योगिक धानी रायगढ़ जिला, जिसे ‘पावर हब’ के रूप में जाना जाता है, आज खुद बिजली की भारी किल्लत से जूझ रहा है। विडंबना यह है कि जिस जिले की ज़मीन से निकले कोयले और जिस जिले के पानी से पूरे प्रदेश के घर रोशन हो रहे हैं, वहां की जनता अघोषित बिजली कटौती के कारण पसीने से तरबतर है
रायगढ़ जिला ऊर्जा उत्पादन का प्रमुख केंद्र है। यहाँ से भारी मात्रा में कोयले का खनन होता है और बिजली संयंत्रों के लिए जिले के जल संसाधनों का भरपूर उपयोग किया जाता है। लेकिन औद्योगिक विकास की इस दौड़ में आम जनता को किनारे कर दिया गया है। ग्रामीणों का कहना है कि “हमारा कोयला जा रहा है, हमारा पानी इस्तेमाल हो रहा है और प्रदूषण भी हम ही झेल रहे हैं, फिर भी हमें ही बिजली के लिए तरसना पड़ रहा है।”

विद्युत विभाग के खिलाफ बढ़ता आक्रोश
भीषण गर्मी में बिजली विभाग की लचर व्यवस्था ने लोगों के सब्र का बांध तोड़ दिया है। शहर के साथ-साथ पुसौर, तमनार और घरघोड़ा जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में भी बिजली की स्थिति बदतर है। लोगों का आरोप है कि सारा ध्यान उद्योगों को निर्बाध बिजली देने पर है, जबकि घरेलू उपभोक्ताओं को ‘लोकल फॉल्ट’ के नाम पर परेशान किया जा रहा है।
मुख्य समस्याएं जो जनता झेल रही है:
- अघोषित कटौती: बिना किसी पूर्व सूचना के दिन और रात में घंटों बिजली बंद।
- लो-वोल्टेज: बिजली आने पर भी वोल्टेज इतना कम होता है कि कूलर और पंखे नहीं चल पाते।
- प्रदूषण और गर्मी की दोहरी मार: उद्योगों की चिमनियों से निकलती राख और गर्मी के बीच बिजली न होना जानलेवा साबित हो रहा है।
पहली रियासत की पड़ताल: क्या यह ‘पावर हब’ का अपमान नहीं?
एक ऐसा जिला जो राजस्व देने में अव्वल है और संसाधन उपलब्ध कराने में सबसे आगे, वहां के नागरिकों को बुनियादी बिजली के लिए सड़कों पर उतरना पड़े, यह प्रशासन की विफलता को दर्शाता है। विद्युत विभाग के अधिकारी इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं, जिससे जनता का गुस्सा और भड़क रहा है।



