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जनता परेशान, नेता मौन: रायगढ़ को मिली ‘स्पेशल’ उपेक्षा, प्रयागराज-विशाखापट्टनम ट्रेन रद्द होने पर जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर उठे सवाल

रायगढ़:
रायगढ़ के रेल यात्रियों की किस्मत में शायद सिर्फ घोषणाओं के झुनझुने और ट्रेनों के रद्द होने का दर्द ही लिखा है। रेलवे ने एक बार फिर यात्रियों को बड़ा झटका देते हुए प्रयागराज-विशाखापट्टनम-प्रयागराज साप्ताहिक स्पेशल ट्रेन (04159/04160) के फेरे सितंबर से नवंबर तक के लिए रद्द कर दिए हैं। कारण बताया गया है—”कम यात्री संख्या” (Low Occupancy)।
हैरानी की बात यह है कि जहां पूरे अंचल के लोग ट्रेनों में लंबी वेटिंग लिस्ट और धक्का-मुक्की झेलने को मजबूर हैं, वहीं रेलवे कागजों पर ‘यात्री नहीं मिल रहे’ का बहाना बनाकर ट्रेनें बंद कर रहा है। इससे भी बड़ा तमाशा रायगढ़ के जनप्रतिनिधियों की चुप्पी है, जो चुनाव के वक्त जनता के हक की दुहाई देते नहीं थकते, लेकिन रेलवे के इस तुगलकी फरमान पर मुंह में दही जमाए बैठे हैं।
कागजों पर फैसला, जमीन पर जनता बेहाल
रद्द होने वाली ट्रेनें: गाड़ी संख्या 04159 (प्रयागराज से विशाखापट्टनम) 04 सितंबर 2026 से 27 नवंबर 2026 तक और वापसी में गाड़ी संख्या 04160 (विशाखापट्टनम से प्रयागराज) 05 सितंबर 2026 से 28 नवंबर 2026 तक के लिए रद्द कर दी गई है।
तर्क पर सवाल: रेलवे का दावा है कि इस रूट पर यात्री नहीं हैं। सवाल यह उठता है कि क्या स्पेशल ट्रेनों का किराया सामान्य से डेढ़-दो गुना रखने, खराब समय-सारणी तय करने और सही प्रचार-प्रसार न होने के कारण यह स्थिति बनी? यदि हां, तो इसकी सजा आम यात्रियों को क्यों दी जा रही है?
माननीयों से तीखे सवाल
रायगढ़ औद्योगिक जिला है, जहां से रेलवे को मालभाड़े के रूप में अरबों रुपये का राजस्व मिलता है। इसके बावजूद यात्री सुविधाओं के नाम पर रायगढ़ को लगातार ठगा जा रहा है।
जब ट्रेनों की कटौती होती है, तो रायगढ़ के सांसद और विधायक रेलवे बोर्ड या मंत्रालय के सामने दहाड़ते क्यों नहीं?
क्या जनप्रतिनिधियों का काम केवल नई ट्रेनों के समय फीता काटना और सोशल मीडिया पर फोटो खिंचवाना ही रह गया है?
त्यौहारों का सीजन सिर पर है, ऐसे में लंबी दूरी की ट्रेन बंद होने से आम आदमी अन्य ट्रेनों में भेड़

-बकरियों की तरह सफर करने को मजबूर होगा। इस पर कोई ठोस हस्तक्षेप क्यों नहीं हो रहा?
अगर रायगढ़ के नेता अब भी अपनी कुंभकर्णी नींद से नहीं जागे, तो आने वाले समय में रेलवे इसी ‘लो ऑक्यूपेंसी’ का बहाना बनाकर कई और जरूरी ट्रेनों पर कैंची चला देगा। जनता पूछ रही है—हमारे वोटों से सदन तक पहुंचे प्रतिनिधि कब रेलवे की मनमानी के खिलाफ आवाज बुलंद करेंगे?

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